काहाँ ‘पूर्णानन्दैश्वर्य’ कृष्ण ‘मायेश्वर’! ।
काहाँ ‘क्षुद्र’ जीव ‘दुःखी’, ‘मायार किङ्कर’! ॥126॥
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अनुवाद
"जबकि कृष्ण, परम सत्य, भगवान् का सर्वोच्च व्यक्तित्व, दिव्य आनंद से परिपूर्ण हैं, सभी छह आध्यात्मिक ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं, और भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं, क्षुद्र बद्धजीव, जो सदैव दुखी रहता है, भौतिक ऊर्जा का दास है।
“Where is the Supreme Truth, the Supreme Personality of Godhead, Krishna, full of transcendental bliss, endowed with the six perfect spiritual opulences, and master of material energy, and where is the lowly conditioned soul, who is always in misery and a slave to material energy.”
तात्पर्य
जीवित-सत्ता सदैव भौतिक ऊर्जा की दास रहती है, जबकि कृष्ण, परम भगवान, भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं। फिर कैसे ये बराबर हो सकते हैं? इन दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। भगवान सदैव परमानंद की दिव्य स्थिति में रहते हैं, जबकि बद्ध आत्मा सदैव भौतिक ऊर्जा के संपर्क में रहने के कारण दुखी रहती है। परम भगवान भौतिक ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं और भौतिक ऊर्जा बद्ध आत्माओं को नियंत्रित करती है। इसलिए परम भगवान और साधारण जीवित सत्ता की तुलना नहीं की जा सकती।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥