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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  3.5.121 
आर एक करियाछ परम ‘प्रमाद’! ।
देह - देहि - भेद ईश्वरे कैले ‘अपराध’! ॥121॥
 
 
अनुवाद
"तुम पूर्णतः भ्रम में हो, क्योंकि तुमने भगवान जगन्नाथ या श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर और आत्मा में भेद कर लिया है। यह बहुत बड़ा अपराध है।"
 
You are completely deluded because you have made a distinction between the body and soul of the Lord (Jagannath or Sri Chaitanya Mahaprabhu). This is a grave offense.
तात्पर्य
जब कोई परमेश्वर के शरीर एवं आत्मा के बीच अंतर करता है, तो वह तुरंत ही अपराधी बन जाता है। क्योंकि भौतिक दुनिया में रहने वाले प्राणी सामान्य रूप से भौतिक देह में रहते हैं। एक साधारण मनुष्य की आत्मा और शरीर एक समान नहीं हो सकते। परमेश्वर हमारे कर्मों का फल प्रदान करते हैं, क्योंकि वे कर्मफलों के स्वामी हैं। वे सभी कारणों के कारण हैं और भौतिक ऊर्जा के स्वामी हैं। इसलिए वे सर्वोपरि हैं। हालाँकि, एक साधारण प्राणी अपनी भौतिक स्थिति में अपने ही कर्मफलों को अनुभव करता है और इसलिए उनके प्रभाव में आ जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्म-भूत स्थिति में भी वह परमेश्वर की सेवा करता है। इसलिए एक साधारण मनुष्य और परमेश्वर के बीच भेद होता है। कर्मी और ज्ञानी जो इस भेद को नजरअंदाज करते हैं, वे परमेश्वर के चरणकमल के अपराधी हैं।

एक साधारण मनुष्य भौतिक ऊर्जा के अधीन होता रहता है, जबकि परमेश्वर - श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान कृष्ण या भगवान जगन्नाथ - हमेशा भौतिक ऊर्जा के स्वामी रहते हैं और इसलिए कभी भी इसके प्रभाव में नहीं आते। परमेश्वर की आध्यात्मिक पहचान असीमित है, यह कभी कम नहीं होती, जबकि प्राणी की चेतना सीमित और खंडित होती है। प्राणी परमेश्वर के अंश है (मामेवांशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः)। ऐसा नहीं है कि वे कंडिशंड जीवन में भौतिक ऊर्जा से ढके हुए हैं, बल्कि भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से मुक्त होकर परमेश्वर के साथ एक हो जाते हैं। ऐसा विचार करना अपमानजनक है।

मायावादी मूर्खों के विचार के अनुसार, परमेश्वर भौतिक दुनिया में प्रकट होने पर एक भौतिक शरीर स्वीकार करते हैं। हालाँकि, एक वैष्णव अच्छी तरह से जानता है कि कृष्ण, भगवान जगन्नाथ या श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए - साधारण मनुष्य के विपरीत - शरीर और आत्मा के बीच कोई अंतर नहीं होता है। भौतिक दुनिया में भी परमेश्वर अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण ने अपने बचपन के शरीर में भी सभी ऐश्वर्य दिखाया। कृष्ण के शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं है, चाहे वे अपने बचपन के शरीर में हों या युवा अवस्था में हों, वे हमेशा अपने शरीर के समान हैं। भले ही कृष्ण एक साधारण मनुष्य की तरह दिखाई देते हों, लेकिन वे भौतिक दुनिया के नियमों और विनियमों के अधीन नहीं हैं। वे स्वराट हैं, या पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वे भौतिक दुनिया में प्रकट हो सकते हैं, लेकिन मायावाद स्कूल के अपमानजनक निष्कर्ष के विपरीत, उनका कोई भौतिक शरीर नहीं होता। इस संबंध में श्रीमद भागवतम (1.11.38) के उपर्युक्त श्लोक का फिर से उल्लेख किया जा सकता है:

एतद ईशानम ईशस्य प्रकृति-स्थोऽपि तद्-गुणैः

न युज्यते सदाऽऽत्म-स्थैर यथा बुद्धिस्तद-आश्रया

परमेश्वर का एक शाश्वत आध्यात्मिक शरीर होता है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के शरीर और आत्मा के बीच अंतर करने का प्रयास करता है, तो वह एक महान अपराध करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)