एक साधारण मनुष्य भौतिक ऊर्जा के अधीन होता रहता है, जबकि परमेश्वर - श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान कृष्ण या भगवान जगन्नाथ - हमेशा भौतिक ऊर्जा के स्वामी रहते हैं और इसलिए कभी भी इसके प्रभाव में नहीं आते। परमेश्वर की आध्यात्मिक पहचान असीमित है, यह कभी कम नहीं होती, जबकि प्राणी की चेतना सीमित और खंडित होती है। प्राणी परमेश्वर के अंश है (मामेवांशो जीव लोके जीव भूतः सनातनः)। ऐसा नहीं है कि वे कंडिशंड जीवन में भौतिक ऊर्जा से ढके हुए हैं, बल्कि भौतिक ऊर्जा के प्रभाव से मुक्त होकर परमेश्वर के साथ एक हो जाते हैं। ऐसा विचार करना अपमानजनक है।
मायावादी मूर्खों के विचार के अनुसार, परमेश्वर भौतिक दुनिया में प्रकट होने पर एक भौतिक शरीर स्वीकार करते हैं। हालाँकि, एक वैष्णव अच्छी तरह से जानता है कि कृष्ण, भगवान जगन्नाथ या श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए - साधारण मनुष्य के विपरीत - शरीर और आत्मा के बीच कोई अंतर नहीं होता है। भौतिक दुनिया में भी परमेश्वर अपनी आध्यात्मिक पहचान बनाए रखते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण ने अपने बचपन के शरीर में भी सभी ऐश्वर्य दिखाया। कृष्ण के शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं है, चाहे वे अपने बचपन के शरीर में हों या युवा अवस्था में हों, वे हमेशा अपने शरीर के समान हैं। भले ही कृष्ण एक साधारण मनुष्य की तरह दिखाई देते हों, लेकिन वे भौतिक दुनिया के नियमों और विनियमों के अधीन नहीं हैं। वे स्वराट हैं, या पूरी तरह से स्वतंत्र हैं। वे भौतिक दुनिया में प्रकट हो सकते हैं, लेकिन मायावाद स्कूल के अपमानजनक निष्कर्ष के विपरीत, उनका कोई भौतिक शरीर नहीं होता। इस संबंध में श्रीमद भागवतम (1.11.38) के उपर्युक्त श्लोक का फिर से उल्लेख किया जा सकता है:
एतद ईशानम ईशस्य प्रकृति-स्थोऽपि तद्-गुणैः
न युज्यते सदाऽऽत्म-स्थैर यथा बुद्धिस्तद-आश्रया
परमेश्वर का एक शाश्वत आध्यात्मिक शरीर होता है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के शरीर और आत्मा के बीच अंतर करने का प्रयास करता है, तो वह एक महान अपराध करता है।
