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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 5: प्रद्युम्न मिश्र का रामानन्द राय से उपदेश लेना  »  श्लोक 114
 
 
श्लोक  3.5.114 
कवि कहे , - जगन्नाथ - सुन्दर - शरीर ।
चैतन्य - गोसाञि - शरीरी महा - धीर ॥114॥
 
 
अनुवाद
कवि ने कहा, "भगवान जगन्नाथ एक अत्यंत सुंदर शरीर हैं, और श्री चैतन्य महाप्रभु, जो अत्यंत गंभीर हैं, उस शरीर के स्वामी हैं।
 
The poet said, “Jagannathji is a very beautiful body and Sri Chaitanya Mahaprabhu, who is very patient, is the master of that body.”
तात्पर्य
शारीरी उस व्यक्ति को दर्शाता है जो शरीर का स्वामी है। जैसा कि भगवद्गीता (2.13) में कहा गया है:

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा

तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति

“जैसे देह में आत्मा निरंतर बचपन से युवावस्था और फिर बुढ़ापे की अवस्था में प्रवेश करती है, ठीक उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। एक विवेकी व्यक्ति इस तरह के परिवर्तन से विचलित नहीं होता।” भौतिक अस्तित्व में एक साधारण जीव के लिए, शरीर और शरीर के स्वामी के बीच एक विभाजन या भेद होता है। हालाँकि, आध्यात्मिक अस्तित्व में ऐसा कोई भेद नहीं होता, क्योंकि शरीर स्वयं स्वामी होता है और स्वामी स्वयं शरीर होता है। आध्यात्मिक अस्तित्व में, सब कुछ आध्यात्मिक होना चाहिए। इसलिए शरीर और उसके स्वामी के बीच कोई भेद नहीं होता।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)