देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति
“जैसे देह में आत्मा निरंतर बचपन से युवावस्था और फिर बुढ़ापे की अवस्था में प्रवेश करती है, ठीक उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। एक विवेकी व्यक्ति इस तरह के परिवर्तन से विचलित नहीं होता।” भौतिक अस्तित्व में एक साधारण जीव के लिए, शरीर और शरीर के स्वामी के बीच एक विभाजन या भेद होता है। हालाँकि, आध्यात्मिक अस्तित्व में ऐसा कोई भेद नहीं होता, क्योंकि शरीर स्वयं स्वामी होता है और स्वामी स्वयं शरीर होता है। आध्यात्मिक अस्तित्व में, सब कुछ आध्यात्मिक होना चाहिए। इसलिए शरीर और उसके स्वामी के बीच कोई भेद नहीं होता।
