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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  3.4.81 
निज - प्रिय - स्थान मोर - मथुरा - वृन्दावन ।
ताहाँ एत धर्म चाहि करिते प्रचारण ॥81॥
 
 
अनुवाद
"मथुरा-वृन्दावन मेरा अत्यंत प्रिय धाम है। मैं वहाँ कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए अनेक कार्य करना चाहता हूँ।"
 
"Mathura-Vrindavan is my most beloved home. I want to do many things there to spread Krishna consciousness."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु श्रील सनातन गोस्वामी के व्याख्यात्मक प्रयासों के जरिए अनेक उद्देश्यों को पूर्ण करना चाहते थे। सबसे पहले सनातन गोस्वामी ने बृहद-भागवतामृत नामक पुस्तक संकलित की ताकि लोगों को बताया जा सके कि कैसे भक्त बनना है, भावनात्मक सेवा का अभ्यास करना है और कृष्ण से प्रेम प्राप्त करना है। दूसरा, उन्होंने हरि-भक्ति-विलास संकलित किया, जिसमें उन्होंने इस संबंध में आधिकारिक शास्त्रीय आदेशों को इकट्ठा किया कि एक वैष्णव को कैसे व्यवहार करना चाहिए। केवल श्री सनातन गोस्वामी के प्रयासों से ही वृंदावन क्षेत्र में खोई हुई तीर्थयात्रा स्थलों की खुदाई हो सकी। उन्होंने वृंदावन क्षेत्र में प्रथम देवता, मदन-मोहन की स्थापना की और अपने व्यक्तिगत व्यवहार से उन्होंने सिखाया कि किसी को त्याग के क्रम में किस तरह कार्य करना चाहिए, पूरी तरह से ईश्वर की सेवा में समर्पित रहना चाहिए। अपने व्यक्तिगत उदाहरण से उन्होंने लोगों को सिखाया कि भावनात्मक सेवा के अभ्यास के लिए कैसे वृंदावन में रहना चाहिए। श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राथमिक मिशन कृष्ण चेतना का प्रचार करना था। मथुरा और वृंदावन भगवान कृष्ण के निवास हैं। इसलिए ये दो स्थान श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यधिक प्रिय हैं और वह सनातन गोस्वामी के माध्यम से उनकी महिमा का विकास करना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)