श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.4.42 
रघुनाथेर पाद - पद्म छाड़ान ना याय ।
छाड़िबार मन हैले प्राण फाटि’ झाय’ ॥42॥
 
 
अनुवाद
“मेरे लिए भगवान रघुनाथ के चरणकमलों का त्याग करना असम्भव है। जब मैं उन्हें त्यागने का विचार भी करता हूँ, तो मेरा हृदय विदीर्ण हो जाता है।”
 
It is impossible for me to leave the lotus feet of Lord Raghunath. My heart breaks when I even think of leaving them.”
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)