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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 3: अन्त्य लीला
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अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट
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श्लोक 41
श्लोक
3.4.41
कृपा करि’ मोरे आज्ञा देह’ दुइ - जन ।
जन्मे - जन्मे सेवों रघुनाथेर चरण ॥41॥
अनुवाद
आप दोनों मुझ पर कृपा करें और मुझे ऐसा आदेश दें कि मैं जन्म-जन्मान्तर तक भगवान रघुनाथ के चरणकमलों की सेवा करता रहूँ।
“You both should be kind to me and give me such orders that I may serve the lotus feet of Lord Raghunath in every birth.”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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