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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 221
 
 
श्लोक  3.4.221 
‘हरि - भक्ति - विलास’ - ग्रन्थ कैला वैष्णव - आचार ।
वैष्णवेर कर्तव्य याहाँ पाइये पार ॥221॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने हरिभक्ति विलास का भी संकलन किया, जिससे हम एक भक्त के आदर्श आचरण और एक वैष्णव के कर्तव्य की पूर्ण सीमा को समझ सकते हैं।
 
He also compiled Haribhakti Vilasaka, from which we can understand the ideal conduct of a devotee and the full extent of the duties of a Vaishnava.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर लिखते हैं, "हरि-भक्ति-विलास मूल रूप से श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा संकलित किया गया था। बाद में, गोपाल भट्ट गोस्वामी ने इसका संक्षिप्त संस्करण बनाया और दिग-दर्शन-टीका जोड़ी। हरि-भक्ति-विलास में सात्वत शास्त्रों के इतने सारे उद्धरण हैं कि कभी-कभी पूछताछ की जाती है कि नास्तिक स्मार्त उन्हें कैसे स्वीकार करने से इंकार कर सकते हैं और इसके बजाय कुछ अन्य राय रख सकते हैं। हरि-भक्ति-विलास में जो दर्ज किया गया है वह वैदिक ग्रंथों का कड़ाई से पालन करता है और निश्चित रूप से शुद्ध है, लेकिन कर्मियों का रवैया हमेशा विशुद्ध वैष्णव समझ के निष्कर्ष को छोड़ने का होता है। क्योंकि कर्मी दुनिया और भौतिक गतिविधियों से बहुत अधिक जुड़े होते हैं, वे हमेशा नास्तिक सिद्धांतों को स्थापित करने की कोशिश करते हैं जो वैष्णवों की समझ का विरोध करते हैं।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)