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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 4: जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की भेंट  »  श्लोक 173
 
 
श्लोक  3.4.173 
अप्राकृत - देह तोमार ‘प्राकृत’ कभु नय ।
तथापि तोमार ताते प्राकृत - बुद्धि हय ॥173॥
 
 
अनुवाद
"वास्तव में आपका शरीर पारलौकिक है, कभी भौतिक नहीं। हालाँकि, आप इसे एक भौतिक अवधारणा के रूप में सोच रहे हैं।
 
In reality, your body is divine, not physical. But you are thinking of it with a physical mind.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपनी राय इस बारे में दी है कि कैसे प्रभु की सेवा में पूर्ण रूप से लिप्त एक व्यक्ति अपने शरीर को भौतिक से दिव्य में बदल लेता है। वे कहते हैं, "भगवान कृष्ण की सेवा में लगा एक पवित्र भक्त अपनी व्यक्तिगत इंद्रियों की तुष्टि की कोई इच्छा नहीं रखता है, और इस प्रकार वह कभी भी उस उद्देश्य के लिए कुछ भी स्वीकार नहीं करता है। वह केवल भगवान कृष्ण, भगवान के आनंद की कामना करता है, और कृष्ण के लिए अपने आनंदमय प्रेम के कारण, वह विभिन्न तरीकों से कार्य करता है। कर्मी सोचते हैं कि भौतिक शरीर भौतिक सुख का साधन है, और इसलिए वे बहुत मेहनत करते हैं। हालाँकि, एक भक्त की ऐसी कोई इच्छा नहीं होती है। एक भक्त हमेशा पूरे मन से प्रभु की सेवा में लगा रहता है, शारीरिक अवधारणाओं और शारीरिक क्रियाओं को भूलकर। एक कर्मी के शरीर को भौतिक इसलिए कहा जाता है क्योंकि कर्मी भौतिक गतिविधियों में बहुत अधिक लीन होने के कारण भौतिक सुविधाओं का आनंद लेने के लिए हमेशा उत्सुक रहता है, लेकिन एक भक्त जो प्रभु की सेवा में पूरी तरह से लिप्त होकर कृष्ण की संतुष्टि के लिए बहुत मेहनत करने की पूरी कोशिश करता है, उसके शरीर को दिव्य माना जाना चाहिए। जबकि कर्मी केवल अपनी इंद्रियों की व्यक्तिगत संतुष्टि में रुचि रखते हैं, भक्त सर्वोच्च भगवान की संतुष्टि के लिए काम करते हैं। इसलिए जो लोग भक्ति और साधारण कर्म में अंतर नहीं कर सकते हैं वे गलती से एक शुद्ध भक्त के शरीर को भौतिक मान सकते हैं। जो जानता है वह ऐसी गलती नहीं करता। वे गैर-भक्त जो भक्ति गतिविधियों और साधारण भौतिक गतिविधियों को एक ही स्तर पर मानते हैं, वे प्रभु के दिव्य पवित्र नाम के जाप का अपमान करने वाले हैं। एक शुद्ध भक्त जानता है कि एक भक्त का शरीर, हमेशा दिव्य होने के कारण, प्रभु की सेवा करने के लिए ही उपयुक्त है।

"भक्ति सेवा के सर्वोच्च मंच पर एक भक्त हमेशा विनम्रतापूर्वक सोचता है कि वह कोई भक्ति सेवा नहीं कर रहा है। वह सोचता है कि वह भक्ति सेवा में गरीब है और उसका शरीर भौतिक है। दूसरी ओर, जिन्हें सहजिया के रूप में जाना जाता है, वे मूर्खतापूर्ण ढंग से सोचते हैं कि उनके भौतिक शरीर दिव्य हैं। इस वजह से, वे हमेशा शुद्ध भक्तों के संग से वंचित रह जाते हैं, और इस प्रकार वे वैष्णवों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। सहजियाओं के दोषों को देखकर, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपनी पुस्तक कल्याण-कल्पतरु में इस प्रकार गाया है:

आमि ता' वैष्णव, ए-बुद्धि ह-इले,

अमानी ना हबा आमि

प्रतिष्ठाशा आसि', हृदय दूषिबे,

हा-इबा नियराय-गामी

निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने,

हबे अभिमान भार

ताइ शिष्य तव, थाकिआ सर्वदा,

ना ला-इबा पूजा कार

"'अगर मैं सोचता हूँ कि मैं एक वैष्णव हूँ, तो मुझे दूसरों से सम्मान प्राप्त करने की उम्मीद होगी। और अगर प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की इच्छा मेरे हृदय को प्रदूषित करती है, तो निश्चित रूप से मैं नरक में जाऊंगा। दूसरों को अपने भोजन के अवशेष देकर, मैं खुद को श्रेष्ठ मानूंगा और झूठे अभिमान के बोझ से दब जाऊंगा। इसलिए, हमेशा आपका समर्पित शिष्य बने रहकर, मैं किसी और से पूजा स्वीकार नहीं करूंगा।' श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने लिखा है (अंत्य-लीला 20.28):

प्रेमेर स्वाभाव — याहाँ प्रेमेर संबंध

सेई माने, — 'कृष्णे मोरा नाही प्रेम-गंध'

"'जहाँ भी भगवान के प्रेम का संबंध होता है, वहाँ प्राकृतिक लक्षण यह होते हैं कि भक्त खुद को भक्त नहीं मानता है, लेकिन हमेशा सोचता रहता है कि उसके पास कृष्ण के लिए प्रेम की एक बूंद भी नहीं है।'"

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)