"भक्ति सेवा के सर्वोच्च मंच पर एक भक्त हमेशा विनम्रतापूर्वक सोचता है कि वह कोई भक्ति सेवा नहीं कर रहा है। वह सोचता है कि वह भक्ति सेवा में गरीब है और उसका शरीर भौतिक है। दूसरी ओर, जिन्हें सहजिया के रूप में जाना जाता है, वे मूर्खतापूर्ण ढंग से सोचते हैं कि उनके भौतिक शरीर दिव्य हैं। इस वजह से, वे हमेशा शुद्ध भक्तों के संग से वंचित रह जाते हैं, और इस प्रकार वे वैष्णवों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते। सहजियाओं के दोषों को देखकर, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने अपनी पुस्तक कल्याण-कल्पतरु में इस प्रकार गाया है:
आमि ता' वैष्णव, ए-बुद्धि ह-इले,
अमानी ना हबा आमि
प्रतिष्ठाशा आसि', हृदय दूषिबे,
हा-इबा नियराय-गामी
निजे श्रेष्ठ जानि', उच्छिष्टादि-दाने,
हबे अभिमान भार
ताइ शिष्य तव, थाकिआ सर्वदा,
ना ला-इबा पूजा कार
"'अगर मैं सोचता हूँ कि मैं एक वैष्णव हूँ, तो मुझे दूसरों से सम्मान प्राप्त करने की उम्मीद होगी। और अगर प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा की इच्छा मेरे हृदय को प्रदूषित करती है, तो निश्चित रूप से मैं नरक में जाऊंगा। दूसरों को अपने भोजन के अवशेष देकर, मैं खुद को श्रेष्ठ मानूंगा और झूठे अभिमान के बोझ से दब जाऊंगा। इसलिए, हमेशा आपका समर्पित शिष्य बने रहकर, मैं किसी और से पूजा स्वीकार नहीं करूंगा।' श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने लिखा है (अंत्य-लीला 20.28):
प्रेमेर स्वाभाव — याहाँ प्रेमेर संबंध
सेई माने, — 'कृष्णे मोरा नाही प्रेम-गंध'
"'जहाँ भी भगवान के प्रेम का संबंध होता है, वहाँ प्राकृतिक लक्षण यह होते हैं कि भक्त खुद को भक्त नहीं मानता है, लेकिन हमेशा सोचता रहता है कि उसके पास कृष्ण के लिए प्रेम की एक बूंद भी नहीं है।'"
