श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  3.20.77 
प्रभुर गम्भीर - लीला ना पारि बुझिते ।
बुद्धि - प्रवेश नाहि ताते, ना पारि वर्णिते ॥77॥
 
 
अनुवाद
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की गहन, अर्थपूर्ण लीलाओं को समझ नहीं पा रहा हूँ। मेरी बुद्धि उन्हें भेद नहीं सकती, इसलिए मैं उनका ठीक से वर्णन नहीं कर पा रहा हूँ।
 
I cannot understand the profound and meaningful pastimes of Sri Chaitanya Mahaprabhu. My intellect cannot penetrate them, so I cannot describe them properly.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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