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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  3.20.55 
सेइ नारी जीये केने, कृष्ण - मर्म व्यथा जाने
तबु कृष्णे करे गाढ़ रोष ।
निज - सुखे माने काज, पडुक तार शिरे वाज
कृष्णेर मात्र चाहिये सन्तोष ॥55॥
 
 
अनुवाद
"एक स्त्री क्यों जीवित रहती है जो जानती है कि कृष्ण का हृदय दुखी है, फिर भी उन पर गहरा क्रोध प्रकट करती है? वह अपने सुख में रुचि रखती है। मैं ऐसी स्त्री के सिर पर वज्र से प्रहार करने की निंदा करता हूँ, क्योंकि हम केवल कृष्ण का सुख चाहते हैं।
 
"Why should a woman who knows that Krishna's heart is grieved and yet expresses deep anger toward him continue to live? She is only interested in her own happiness. I curse such a woman. May a thunderbolt strike her head, for we only desire Krishna's happiness."
तात्पर्य
भगवद्भक्ति में केवल अपने स्वार्थ की सिद्धि मात्र से तृप्त होने वाला भक्त अवश्य ही भगवान्कृष्ण की सेवा से च्युत हो जाता है और तदनन्तर भौतिक सुखों के प्रति आसक्त होकर वह स्वयं को प्रकृति सम्प्रदाय के सहजियाओं में मिला देता है और इस प्रकार निश्चयपूर्वक अवैष्णव हो जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)