श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.20.48 
“आमि - कृष्ण - पद - दासी, तेंहो - रस - सुख - राशि
आलिङ्गिया करे आत्म - साथ ।
किबा ना देय दरशन, जारेन मोर तनु - मन
तबु तेंहो - मोर प्राण - नाथ ॥48॥
 
 
अनुवाद
"मैं कृष्ण के चरणकमलों की दासी हूँ। वे दिव्य सुख और मधुरता के साक्षात स्वरूप हैं। यदि वे चाहें तो मुझे कसकर गले लगाकर मुझे अपने साथ एकत्व का अनुभव करा सकते हैं, या फिर मुझे दर्शन न देकर मेरे मन और शरीर को क्षत-विक्षत कर सकते हैं। फिर भी, वे ही मेरे जीवन के स्वामी हैं।"
 
"I am a slave at Krishna's lotus feet. He is the embodiment of divine bliss and bliss. If he wishes, he can embrace me tightly and make me experience oneness with him. Or, by denying me his darshan, he can burn my mind and body to ashes. Yet, he is my beloved.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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