श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  3.20.34 
कृपा करि’ कर मोरे पद - धूलि - सम ।
तोमार सेवक करों तोमार सेवन” ॥34॥
 
 
अनुवाद
“आप मुझ पर अहैतुकी कृपा करके मुझे अपने चरणकमलों की धूलि के कणों सहित स्थान प्रदान करें, जिससे मैं आपका नित्य सेवक बनकर आपकी सेवा में लग सकूँ।”
 
“Please bless me by giving me a place among the dust particles of your lotus feet, so that I can serve you as your eternal servant.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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