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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  3.20.147 
सबार चरण - कृपा - ‘गुरु उपाध्यायी’ ।
मोर वाणी - शिष्या, तारे बहुत नाचाइ ॥147॥
 
 
अनुवाद
उनके चरणकमलों की कृपा ही मेरे गुरु हैं और मेरे शब्द ही मेरे शिष्य हैं, जिन्हें मैंने नाना प्रकार से नचाया है।
 
The grace of his lotus feet is my Guru and my words are in the form of my disciples, whom I have made dance in many ways.
तात्पर्य
उपाध्यायी, या उपाध्याय, उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो अप्रोच किए जाने पर शिक्षा देता है (उपेत ्य धीयते अस्मात)। मनु-संहिता में कहा गया है:

एक-देशम् तु वेदस्य वेदांगाण्य पि वा पुनः

योऽध्यापयति वृत्ति-अर्थम उपाध्यायः स उच्यते

"जो व्यक्ति दूसरों को वेदों अथवा वेदों के पूरक साहित्यों का एक भाग सिखाता है उसे उपाध्याय कहा जा सकता है।" उपाध्याय उस व्यक्ति को भी संदर्भित करता है जो कला सिखाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)