श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  3.20.136 
ऊनविंशे - भित्त्ये प्रभुर मुख - सङ्घर्षण ।
कृष्णेर विरह - स्फूर्ति - प्रलाप - वर्णन ॥136॥
 
 
अनुवाद
उन्नीसवें अध्याय में वर्णन है कि किस प्रकार भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के वियोग में अपना मुख दीवारों पर रगड़ते हुए पागलों की तरह बोलते थे।
 
The nineteenth chapter describes how Sri Chaitanya Mahaprabhu would rub his face against the walls and talk like a madman due to separation from Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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