श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 20: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  3.20.126 
पञ्चदश - परिच्छेदे - उद्यान - विलासे ।
वृन्दावन - भ्रमे याहाँ करिला प्रवेशे ॥126॥
 
 
अनुवाद
पंद्रहवें अध्याय में वर्णन है कि किस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु समुद्र तट पर एक बगीचे में प्रवेश कर गए और उसे वृन्दावन समझ लिया।
 
The fifteenth chapter describes Sri Chaitanya Mahaprabhu entering a garden on the seashore and mistaking it for Vrindavan.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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