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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.2.95 
वैष्णव ह ञा येबा शारीरक - भाष्य शुने ।
सेव्य - सेवक - भाव छा ड़ि’ आपनारे ‘ईश्वर’ माने ॥95॥
 
 
अनुवाद
"जब कोई वैष्णव शारीरक-भाष्य, जो वेदान्त-सूत्र पर मायावाद की व्याख्या है, सुनता है, तो वह कृष्णभावनाभावित भाव त्याग देता है कि भगवान स्वामी हैं और जीव उनका सेवक है। इसके बजाय, वह स्वयं को परम भगवान मानता है।"
 
"When a Vaishnava listens to the Māyāvādī commentary on the Vedānta-sūtras called Śārīka-bhāsya, he abandons the Kṛṣṇa conscious attitude that the Lord is the master and the living entity is His servant. Instead, he begins to consider himself as God."
तात्पर्य
केवलदवैतावादी के नाम से जाने जाने वाले दार्शनिक सामान्यतया शंकराचार्य द्वारा की गई टीका शारीरक-भाष्य को सुनने में अपने आप को व्यस्त रखते हैं, जो समर्थन करती है कि लोग बिना किसी पक्षपात के स्वयं को परमेश्वर समझें। वेदांत-सूत्र पर ऐसी मायावादी दार्शनिक टिप्पणियां केवल काल्पनिक हैं, लेकिन वेदांत-सूत्र पर अन्य टिप्पणियां भी हैं। श्रील रामानुजाचार्य की टिप्पणी, जिसे श्री-भाष्य के नाम से जाना जाता है, विशिष्टाद्वैत-वाद दर्शन को स्थापित करती है। इसी तरह, ब्रह्म-संप्रदाय में, माध्वाचार्य के पूर्णप्रज्ञा-भाष्य ने शुद्ध-द्वैत-वाद को स्थापित किया है। कुमार-संप्रदाय, या निम्बार्क-संप्रदाय में, श्री निम्बार्क पारिजात-सौरभ-भाष्य में द्वैताद्वैत-वाद के दर्शन को स्थापित करते हैं। और विष्णु-स्वामी-संप्रदाय, या रुद्र-संप्रदाय में, जो भगवान शिव से आता है, विष्णु स्वामी ने सर्वज्ञ-भाष्य नामक एक टिप्पणी लिखी है, जो शुद्धाद्वैत-वाद की स्थापना करती है।

एक वैष्णव को वेदांत-सूत्र पर चार संप्रदाय-आचार्यों, अर्थात श्री रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, विष्णु स्वामी और निम्बार्क द्वारा लिखी गई टिप्पणियों का अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि ये टिप्पणियाँ इस दर्शन पर आधारित हैं कि भगवान मालिक हैं और सभी जीव उनकी शाश्वत सेवा करते हैं। वेदांत दर्शन का सही तरीके से अध्ययन करने वाले को इन टिप्पणियों का अध्ययन अवश्य करना चाहिए, खासकर यदि वह वैष्णव हो। इन टिप्पणियों को वैष्णव हमेशा पवित्र मानते हैं। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती की टिप्पणी का विस्तार से उल्लेख आदि-लीला, अध्याय सात, पाठ 101 में किया गया है। मायावादी टिप्पणी शारीरक-भाष्य एक वैष्णव के लिए जहर की तरह है। इसे बिल्कुल भी नहीं छुआ जाना चाहिए। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं कि कभी-कभी एक महा-भागवत, या अत्यधिक ऊंचे भक्त, जिन्होंने कृष्ण के चरण कमलों में आत्मसमर्पण कर दिया है, अगर वह शारीरक-भाष्य का मायावादी दर्शन सुनता है, तो भी वह शुद्ध भक्ति सेवा से नीचे गिर जाता है। इसलिए सभी वैष्णवों को इस टिप्पणी से दूर रहना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)