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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 2: छोटे हरिदास को दण्ड  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  3.2.14 
सेइ जीवे निज - भक्ति करेन प्रकाशे ।
ताहार दर्शने ‘वैष्णव’ हय सर्व - देशे ॥14॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार उन्होंने जीवों [अपने शुद्ध भक्तों] में अपनी इतनी भक्ति प्रकट करके उन्हें शक्ति प्रदान की कि अन्य सभी देशों के लोग उन्हें देखकर भक्त बन गए।
 
In this way, He possessed the living entities (His pure devotees) by manifesting so much devotion in them that people from all other countries became devotees after seeing Him.
तात्पर्य
जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (अन्त्य 7.11) में कहा गया है:

कली-कालेर धर्म — कृष्ण-नाम-संकीर्तन

कृष्ण-शक्ति बिना नहे तार प्रवर्तन

जब तक कोई भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व, श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अधिकृत नहीं हो जाता, तब तक वह सम्पूर्ण विश्व में हरे कृष्ण महा-मंत्र के पवित्र नामों का प्रसार नहीं कर सकता। जो व्यक्ति ऐसा करते हैं, उन्हें अधिकृत किया जाता है। इसलिये उन्हें कभी-कभी आविष्ट-अवतार, या सशक्त अवतार कहा जाता है, क्योंकि उनमें श्री चैतन्य महाप्रभु की शक्ति होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)