दुर्वार इन्द्रिय करे विषय - ग्रहण ।
दारवी प्रकृति हरे मुनेरपि मन ॥118॥
अनुवाद
"इन्द्रियाँ अपने भोग के विषयों से इतनी दृढ़ता से चिपकी रहती हैं कि एक स्त्री की लकड़ी की मूर्ति भी एक महान संत पुरुष के मन को आकर्षित कर लेती है।
“The senses are so strongly attracted to their objects of enjoyment that even a wooden statue of a woman is sure to attract the mind of even the greatest saint.
तात्पर्य
इन्द्रियाँ और इन्द्रिय-विषय आपस में इतने घनिष्ट रूप से जुड़े हुए हैं कि कठोर तपस्वी के मन में भी नवयुवती के समान काष्ठ की गुड़िया को देख कर आसक्ति उत्पन्न हो जाती है। रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श इन्द्रियाँ आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा के लिए सदैव आकर्षक होती हैं। इन्द्रियाँ और इन्द्रिय-विषयों का स्वाभाविक ही ऐसा परस्पर संबंध है कि कभी-कभी अपनी इन्द्रियों पर संयम रखने का दावा करने वाला भी इन्द्रिय-विषयों के वशीभूत में पड़ ही जाता है। भगवान की सेवा में लगाए और शुद्ध किए बिना इन्द्रियों पर संयम रखना असंभव है। इसीलिए साधक संयमी होने की प्रतिज्ञा करने पर भी कभी-कभी इन्द्रियाँ इन्द्रिय-विषयों से विचलित हो जाती हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥