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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 95
 
 
श्लोक  3.19.95 
हेम - कीलित चन्दन, ताहा क रि’ घर्षण ,
ताहे अगुरु, कुङ्कम, कस्तूरी ।
कर्पूर - सने चर्चा अङ्गे, पूर्व अङ्गेर गन्ध सङ्गे,
मिलि’ तारे येन कैल चुरि ॥95॥
 
 
अनुवाद
“जब चंदन की लकड़ी को अगुरु, कुंकुम, कस्तूरी और कपूर के साथ मिलाकर कृष्ण के शरीर पर फैलाया जाता है, तो यह कृष्ण की मूल शारीरिक सुगंध के साथ मिल जाती है और उसे ढक लेती है।
 
“When sandalwood paste is mixed with aguru, kumkum, musk and camphor and applied to Krishna's body, it mixes with Krishna's original body fragrance and appears to envelop Him.
तात्पर्य
एक अन्य संस्करण में इस पद्य का अंतिम पद इस प्रकार लिखा हुआ है, कामदेवर मन कैला चूरि जिसका अर्थ है की सभी पदार्थो की खुशबू कृष्ण के शरीर की पूर्ववर्ती खुशबू के साथ मिलकर कामदेव का मन चुरा ले जाती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)