श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 93
 
 
श्लोक  3.19.93 
सखि हे, कृष्ण - गन्ध जगत्माताय
नारीर नासाते पशे, सर्व - काल ताहाँ वैसे, ।
कृष्ण - पाश ध रि’ लञा याय ॥93॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, कृष्ण के शरीर की सुगंध समस्त जगत को मोहित कर लेती है। यह विशेष रूप से स्त्रियों के नासिका छिद्रों में प्रवेश करती है और वहीं स्थिर रहती है। इस प्रकार यह उन्हें मोहित कर लेती है और बलपूर्वक कृष्ण के पास ले आती है।
 
"O dear friend, the fragrance of Krishna's body captivates the entire world. It especially enters the nostrils of women and lingers there. Thus, it captivates them and forcibly brings them to Krishna.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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