श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.19.65 
उन्माद - दशाय प्रभुर स्थिर नहे मन ।
येइ करे, येइ बोले सब , - उन्माद - लक्षण ॥65॥
 
 
अनुवाद
इस पागलपन की अवस्था में, श्री चैतन्य महाप्रभु का मन अस्थिर था। वे जो कुछ भी कहते या करते थे, वह सब पागलपन का लक्षण था।
 
In this state of frenzy, Sri Chaitanya Mahaprabhu's mind was unstable. Everything he said or did was symptomatic of frenzy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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