श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  3.19.5 
प्रति - वत्सर प्रभु ताँरे पाठान नदीयाते ।
विच्छेद - दुःखिता जानि’ जननी आश्वासिते ॥5॥
 
 
अनुवाद
भगवान यह जानते हुए कि उनकी माता उनसे वियोग में अत्यन्त दुःखी हैं, हर वर्ष उन्हें सांत्वना देने के लिए जगदानंद पंडित को नवद्वीप भेजते थे।
 
Knowing that his mother was very sad due to his separation, Mahaprabhu used to send Jagannath Pandit to Navadwip every year to console her.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas