श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.19.49 
‘अक्रूर करे तोमार दोष, आमाय केने कर रोष’
इहा यदि कह ‘दुराचार’ ।
तुइ अक्रूर - मूर्ति धरि’, कृष्ण निलि चुरि करि’
अन्येर नहे ऐछे व्यवहार ॥49॥
 
 
अनुवाद
हे दुष्ट विधाता! यदि आप हमें उत्तर देते हैं कि, 'वास्तव में अक्रूर ही दोषी हैं; आप मुझ पर क्रोधित क्यों हैं?' तो मैं आपसे कहता हूँ कि, 'हे विधाता! आपने ही अक्रूर का रूप धारण करके कृष्ण को चुराया है। कोई अन्य ऐसा आचरण नहीं करेगा।'
 
"O wicked Creator! If you say to me, 'Akrura is truly at fault; why are you angry with me?' then I say to you, 'O Creator, you yourself have taken the form of Akrura and stolen Krishna. No one else would behave like this.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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