श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 19: श्री चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्य व्यवहार  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  3.19.105 
धन्यस्यायं नवः प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।
अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठ सु - दुर्गमा ॥105॥
 
 
अनुवाद
"जिस महान् पुरुष के हृदय में भगवत्प्रेम जागृत हो गया है, उसके कार्यकलाप और लक्षण बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं समझ सकते।"
 
“Even the greatest scholar cannot understand the actions and characteristics of a great person in whose heart love for God has arisen.”
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas