|
| |
| |
श्लोक 3.19.105  |
धन्यस्यायं नवः प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।
अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठ सु - दुर्गमा ॥105॥ |
|
| |
| |
| अनुवाद |
| "जिस महान् पुरुष के हृदय में भगवत्प्रेम जागृत हो गया है, उसके कार्यकलाप और लक्षण बड़े-बड़े विद्वान् भी नहीं समझ सकते।" |
| |
| “Even the greatest scholar cannot understand the actions and characteristics of a great person in whose heart love for God has arisen.” |
| ✨ ai-generated |
| |
|