श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.18.50 
भये कम्प हैल, मोर नेत्रे वहे जल ।
गद्गद वाणी, रोम उठिल सकल ॥50॥
 
 
अनुवाद
मैं डर के मारे काँप उठा और आँसू बहाने लगा। मेरी आवाज़ लड़खड़ा गई और मेरे शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गए।
 
“I trembled with fear and tears started flowing from my eyes, my speech became choked and all the hairs on my body stood on end.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)