श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 18: महाप्रभु का समुद्र से बचाव  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.18.43 
विषादे विह्वल सबे, नाहिक ‘चेतन’ ।
तबु प्रेमे बुले करि’ प्रभुर अन्वेषण ॥43॥
 
 
अनुवाद
सभी लोग उदासी और लगभग अचेतन अवस्था में थे, किन्तु प्रेमोन्मत्त होकर वे भगवान की खोज में इधर-उधर भटकते रहे।
 
All the people were overwhelmed with grief and almost unconscious, but out of love they all kept wandering here and there to find Mahaprabhu.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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