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श्लोक 3.18.30  |
तरङ्गे वहिया फिरे, - येन शुष्क काष्ठ ।
के बुझिते पारे एइ चैतन्येर नाट? ॥30॥ |
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| अनुवाद |
| लहरें उन्हें सूखी लकड़ी के टुकड़े की तरह इधर-उधर ले जा रही थीं। श्री चैतन्य महाप्रभु के इस नाटकीय अभिनय को कौन समझ सकता है? |
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| The waves swept him away like a dry log. Who can understand this dramatic performance by Sri Chaitanya Mahaprabhu? |
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