श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  3.17.65 
जीव दीन कि करिबे ताहार वर्णन ? ।
शाखा - चन्द्र - न्याय क रि’ दिग्दरशन ॥65॥
 
 
अनुवाद
मुझ जैसा बेचारा प्राणी उन परिवर्तनों का क्या वर्णन कर सकता है? मैं तो बस उनका एक संकेत ही दे सकता हूँ, मानो किसी पेड़ की शाखाओं के बीच से चाँद दिखा रहा हूँ।
 
How can a mere creature like me describe those disorders? I can only hint at them, like the moon seen through the branches of a tree.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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