श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  3.17.63 
एइ - मत महाप्रभु प्रति - रात्रि - दिने ।
उन्माद चेष्टित हय प्रलाप - वचने ॥63॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन इसी प्रकार विक्षिप्त हो जाते थे और पागलों की तरह बातें करते थे।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu would become frantic like this every night and day and talk like a madman.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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