श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  3.17.58 
औत्सुक्येर प्रावीण्ये, जिति’ अन्य भाव - सैन्ये,
उदय हैल निज - राज्य - मने ।
मने ह - इल लालस, ना हय आपन - वश,
दुःखे मने करेन भर्सने ॥58॥
 
 
अनुवाद
तब परमानंद के अन्य सभी सैनिकों पर प्रबल उत्कंठा छा गई और श्रीमती राधारानी के मन में एक अदम्य इच्छा उत्पन्न हो गई। तब अत्यंत दुःखी होकर उन्होंने अपने मन को धिक्कारा।
 
"Then a great yearning overcame all other forces of feeling, and a desire arose in Srimati Radharani's mind that was beyond control. Then, deeply distressed, she rebuked her own mind.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)