श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  3.17.53 
हा हा सखि, कि करि उपाय!
काँहा करों, काहाँ याङ, काहाँ गेले कृष्ण पाङ ।
कृष्ण विना प्राण मोर याय” ॥53॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्यारे दोस्तों, मैं कृष्ण को कैसे पाऊँगा? मुझे क्या करना चाहिए? मुझे कहाँ जाना चाहिए? मैं उनसे कहाँ मिल सकता हूँ? चूँकि मैं कृष्ण को नहीं पा सकता, इसलिए मेरा जीवन मुझसे दूर जा रहा है।"
 
"O dear friends, how can I find Krishna? What should I do? Where should I go? Where can I meet him? I am dying because I don't see him."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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