श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.17.52 
“एइ कृष्णेर विरहे, उद्वेगे मन स्थिर नहे ,
प्राप्त्युपाय - चिन्तन ना याय ।
येबा तुमि सखी - गण, विषादे बाउल मन ,
कारे पुछों, के कहे उपाय ? ॥52॥
 
 
अनुवाद
"कृष्ण के वियोग से उत्पन्न व्याकुलता ने मुझे अधीर बना दिया है और मैं उनसे मिलने का कोई उपाय नहीं सोच पा रहा हूँ। हे मेरे मित्रों, तुम भी शोक से विक्षिप्त हो। अतः मुझे कौन बताएगा कि उन्हें कैसे पाया जाए?
 
"The anxiety caused by Krishna's separation has made me impatient, and I cannot think of any way to meet him. O friends, you too are becoming mad with grief. So who will tell me how to find him now?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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