श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 17: श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक विकार  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.17.50 
भाव - शाबल्ये राधार उक्ति, लीला - शुके हैल स्फूर्ति
सेइ भावे पड़े एक श्लोक ।
उन्मादेर सामर्थ्य, सेइ श्लोकेर करे अर्थे
येइ अर्थ नाहि जाने लोक ॥50॥
 
 
अनुवाद
इन सभी आनंदों के समुच्चय ने एक बार बिल्वमंगल ठाकुर (लीला-शुक) के मन में श्रीमती राधारानी का एक कथन जगा दिया। उसी आनंदमय भाव में, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अब उस श्लोक का पाठ किया, और उन्मत्तता के बल पर उन्होंने उसका अर्थ बताया, जो सामान्यतः लोगों के लिए अज्ञात है।
 
The combination of these feelings brought to mind a statement of Srimati Radharani in the mind of Bilvamangal Thakur (Lila Shuka). Sri Chaitanya Mahaprabhu then recited the verse in the same spirit and, in a fit of ecstasy, explained its meaning, which is unknown to ordinary people.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)