श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 96
 
 
श्लोक  3.16.96 
‘सुकृति - लभ्य फेला - लव’ - बलेन बार - बार ।
ईश्वर - सेवक पुछे, - ‘कि अर्थ इहार’? ॥96॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने बार-बार कहा, "केवल बड़े भाग्य से ही किसी को भगवान को अर्पित भोजन का एक कण भी मिल सकता है।"
 
Mahaprabhu repeatedly said, “It is only by great fortune that one can obtain even a particle of the offering made to the Lord.” The servants of the Jagannath Temple asked, “What does this mean?”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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