| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान » श्लोक 90 |
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| | | | श्लोक 3.16.90  | माला परा ञा प्रसाद दिल प्रभुर हाते ।
आस्वाद दूरे रहु, यार गन्धे मन माते ॥90॥ | | | | | | | अनुवाद | | भगवान जगन्नाथ के सेवकों ने पहले श्री चैतन्य महाप्रभु को माला पहनाई और फिर उन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रसाद अर्पित किया। प्रसाद इतना स्वादिष्ट था कि उसकी सुगंध ही, स्वाद की तो बात ही छोड़िए, मन को मदहोश कर देती थी। | | | | Lord Jagannath's servants first garlanded Sri Chaitanya Mahaprabhu and then offered him Jagannath's prasad. This prasad was so delicious that, forgetting its taste, its aroma alone was mind-blowing. | | ✨ ai-generated | | |
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