| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 3: अन्त्य लीला » अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान » श्लोक 78 |
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| | | | श्लोक 3.16.78  | ताँ - सबार सङ्गे प्रभुर छिल बाह्य - ज्ञान ।
ताँरा गेले पुनः हैला उन्माद प्रधान ॥78॥ | | | | | | | अनुवाद | | जब तक भक्तगण नीलांचल, जगन्नाथ पुरी में थे, श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी बाह्य चेतना बनाए रखी, किन्तु उनके चले जाने के बाद उनका मुख्य कार्य पुनः कृष्ण के प्रति परमानंद प्रेम का उन्माद था। | | | | As long as these devotees stayed in Neelachal i.e. Jagannathpuri, Sri Chaitanya Mahaprabhu maintained external consciousness, but as soon as they left, Mahaprabhu again got lost in the ecstasy of love for Krishna. | | ✨ ai-generated | | |
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