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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.16.29 
आमि - नीच - जाति, आमार नाहि कृष्ण - भक्ति ।
अन्य ऐछे हय, आमाय नाहि ऐछे शक्ति” ॥29॥
 
 
अनुवाद
"ऐसा पद दूसरों के लिए उपयुक्त हो सकता है, लेकिन मेरे पास ऐसी आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। मैं निम्न वर्ग से हूँ और कृष्ण के प्रति मेरी भक्ति ज़रा भी नहीं है।"
 
"Such a position may be suitable for others, but I do not possess such spiritual strength. I am of a low caste and do not have even a trace of devotion for Krishna."
तात्पर्य
अपने कथन में, झाडू ठाकुर ने खुद को नीच जाति के परिवार में जन्मे हुए बताया है और भगवान कृष्ण के निःस्वार्थ भक्त के गुणों से रहित व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। वह उन कथनों को स्वीकार करते हैं जो घोषणा करते हैं कि कोई नीची जाति का व्यक्ति अत्यधिक ऊँचे दर्जे का होता है यदि वह वैष्णव है। हालाँकि, वह महसूस करते हैं कि श्रीमद्भागवत में दिए गए ये वर्णन दूसरों का उचित वर्णन करते हैं, परन्तु स्वयं उनका नहीं। झाडू ठाकुर का दृष्टिकोण वास्तव में एक वास्तविक वैष्णव का है, क्योंकि एक वैष्णव कभी भी खुद को महान नहीं मानता, भले ही वह वास्तव में ऐसा हो। वह हमेशा विनीत और नम्र होता है और कभी नहीं सोचता कि वह एक उन्नत भक्त है। वह खुद को निम्न दर्जे पर रखता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह वास्तव में निम्न है। सनातन गोस्वामी ने एक बार कहा था कि वह एक नीची जाति के परिवार से थे, क्योंकि हालाँकि उनका जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था, लेकिन एक सरकारी मंत्री के रूप में अपनी सेवा में उन्होंने म्लेच्छों और यवनों के साथ संबंध बनाया था। इसी तरह, झाडू ठाकुर ने खुद को ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जो नीची जाति से संबंधित है, लेकिन वह वास्तव में ब्राह्मण परिवारों में जन्म लेने वाले कई लोगों से ऊपर थे। इसका प्रमाण न केवल श्रीमद्भागवत में है, जैसा कि कालिदास ने श्लोक 26 और 27 में उद्धृत किया है, बल्कि अन्य शास्त्रों में भी इस निष्कर्ष के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं। उदाहरण के लिए, महाभारत (वन-पर्व, अध्याय 177, श्लोक 20) में कहा गया है:

"शुद्र तु यद भवेल लक्ष्म द्विजे तच् च न विद्यते

न वै शुद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मण:"

"यदि कोई शुद्र जन्म ब्राह्मण की विशेषताओं को रखता है और कोई ब्राह्मण जन्म उन्हें नहीं रखता है, तो उस शूद्र को शूद्र नहीं जाना जाना चाहिए, और उस ब्राह्मण को ब्राह्मण नहीं जाना जाना चाहिए।"

इसी तरह, वन-पर्व में, अध्याय 203, श्लोक 11-12 में कहा गया है:

"शुद्र-योनि हि जातस्य सद् गुणानुपतिष्ठतः

आरजवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यम अभिजायते"

"यदि किसी शूद्र परिवार में जन्म लेने वाले व्यक्ति ने ब्राह्मण के गुणों को विकसित कर लिया है, जैसे - सत्य [सत्यता], शम [शांति], दम [आत्म-नियंत्रण] और आरजव [सरलता] तो वह ब्राह्मण के श्रेष्ठ पद को प्राप्त करता है।"

और अनुशासन-पर्व में, अध्याय 163 में कहा गया है:

"स्थितो ब्राह्मण-धर्मेण ब्राह्मण्यम उपजीवति

क्षत्रियो वाथ वैश्यो वा ब्रह्म-भूयः स गच्छति

एभिस्तु कर्मभिर् देवि शुभैराचरितैस्तथा

शुद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेट

न योनिर् नापि संस्कारो न श्रुतं न च सतितिः

कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तम् एव तु कारणम्"

"यदि कोई व्यक्ति वास्तविक रूप से एक ब्राह्मण के व्यवसाय में स्थित है, तो उसे ब्राह्मण माना जाना चाहिए, भले ही वह किसी क्षत्रिय या वैश्य परिवार में पैदा हुआ हो। हे देवी, भले ही कोई शुद्र पैदा हुआ हो, अगर वह वास्तव में ब्राह्मण के पेशे और पवित्र व्यवहार में लगा हुआ है, तो वह ब्राह्मण बन जाता है। इसके अलावा, एक वैश्य एक क्षत्रिय बन सकता है। इसलिए, न तो किसी के जन्म का स्रोत, न उसका सुधार और न ही उसकी शिक्षा ब्राह्मण होने का मानदंड है। वृत्त, या व्यवसाय, वास्तविक मानक है जिसके द्वारा किसी को ब्राह्मण के रूप में जाना जाता है।"

हमने देखा है कि एक व्यक्ति जो एक डॉक्टर का बेटा नहीं है और जिसने मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई नहीं की है, वह कभी-कभी चिकित्सा का अभ्यास करने में सक्षम होता है। सर्जिकल ऑपरेशन कैसे करें, दवा कैसे मिलाएँ और कुछ बीमारियों के लिए कुछ दवाएँ कैसे दें, के व्यावहारिक ज्ञान से, एक व्यक्ति प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकता है और व्यावहारिक क्षेत्र में चिकित्सा व्यवसायी के रूप में पंजीकृत हो सकता है। वह एक चिकित्सा व्यक्ति का काम कर सकता है और उसे डॉक्टर के रूप में जाना जा सकता है। हालाँकि योग्य चिकित्सा पुरुष उसे एक ढोंगी मान सकते हैं, लेकिन सरकार उसके काम को मान्यता देगी। विशेष रूप से भारत में, ऐसे कई डॉक्टर हैं जो अपनी चिकित्सीय सेवाओं को पूरी तरह से करते हैं। उन्हें सरकार द्वारा भी स्वीकार किया जाता है। इसी तरह, यदि कोई ब्राह्मण सेवा या व्यावसायिक कर्तव्यों में लगा हुआ है, तो उसे परिवार की परवाह किए बिना ब्राह्मण माना जाना चाहिए। यही सभी शास्त्रों का निर्णय है।

श्रीमद्भागवत (7.11.35) में कहा गया है:

"यस्य यल लक्षणं प्रोक्तं पुंसो वर्णाभिव्यंजकम्

यद अन्यत्रापि दृश्येत तत्तेनेव विनिर्दिशेत

यह महाराज युधिष्ठिर को नारद मुनि का कथन है, जिसमें नारद का कहना है कि एक ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के लक्षण सभी शास्त्रों में वर्णित हैं। इसलिए, यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के लक्षणों और गुणों का प्रदर्शन करते हुए पाया जाता है और एक ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य के व्यवसाय में सेवा कर रहा है, भले ही वह जन्म से ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य न हो, उसे योग्यता के अनुसार माना जाना चाहिए। और व्यवसाय।

इसी तरह, पद्म पुराण में कहा गया है:

न शूद्रा भगवद्-भक्ताः ते तु भगवता मताः

सर्व-वर्णेषु ते शूद्रा ये न भक्ता जनार्दने

"किसी भक्त को कभी भी शूद्र नहीं माना जाना चाहिए। भगवान भगवान के सभी भक्तों को भागवत के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। यदि कोई भगवान कृष्ण का भक्त नहीं है, तथापि, भले ही ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य परिवार में जन्म लिया हो, उसे शूद्र माना जाना चाहिए।"

पद्म पुराण में यह भी कहा गया है:

श्व-पाकम इव नेक्षेता लोके विप्रम अवैष्णवम्

वैष्णवो वर्णो-बाह्यः अपि पुनति भुवन-त्रयम्

"यदि ब्राह्मण परिवार में जन्मा व्यक्ति अवैष्णव है, भक्त नहीं है, तो उसे अपना चेहरा नहीं देखना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे चांडाल या कुत्ते खाने वाले के चेहरे पर नहीं देखना चाहिए। हालाँकि, वैश्य से इतर वर्णों में पाया गया वैष्णव तीनों लोकों को शुद्ध कर सकता है।"

पद्म पुराण आगे कहता है:

शूद्रं वा भगवद्-भक्तं निषादं श्व-पचं तथा

वीक्षते जाति-सामान्यात् स याति नरकं ध्रुवम

"जो कोई भगवान के भक्त को, जो शूद्रों, निषादों या चांडालों के परिवार में पैदा हुआ था, उस जाति का मानता है, निश्चित रूप से नरक जाता है।"

एक ब्राह्मण को वैष्णव और विद्वान विद्वान होना चाहिए। इसलिए भारत में एक ब्राह्मण को पंडित कहने की प्रथा है। ब्राह्मण के ज्ञान के बिना भगवान को नहीं समझा जा सकता। इसलिए एक वैष्णव पहले से ही एक ब्राह्मण है, जबकि एक ब्राह्मण वैष्णव बन सकता है। गरुड़ पुराण में कहा गया है:

भक्तिर अष्ट-विधा ह्य एषा यस्मिन् म्लेच्छे अपि वर्तते

स विप्रेन्द्रो मुनि-श्रेष्ठः स ज्ञानी स च पंडितः

"यदि कोई म्लेच्छ भी पैदा हुआ हो, यदि वह भक्त बन जाता है तो उसे सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण और विद्वान पंडित मानना चाहिए।"

इसी तरह, तत्व-सागर कहता है:

यथा कांचनतां याति कांस्यं रस-विधानतः

तथा दीक्षा-विधानेन द्विजत्वं जायते नृणाम्

"जैसे घंटी धातु को रसायन प्रक्रिया में पारे के साथ मिलाने पर सोना बन जाता है, वैसे ही जो व्यक्ति किसी सच्चे आध्यात्मिक गुरु द्वारा उचित रूप से प्रशिक्षित और दीक्षित होता है, वह तुरंत ब्राह्मण बन जाता है।" प्रकट शास्त्रों में पाए जाने वाले ये सभी प्रमाण सिद्ध करते हैं कि वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार, वैष्णव को कभी भी अभ्राह्मण या गैर-ब्राह्मण नहीं माना जाना चाहिए। भले ही म्लेच्छ या यवन परिवार में जन्म हो, लेकिन वैष्णव को निम्न जाति का नहीं समझना चाहिए। क्योंकि वह भगवान कृष्ण का भक्त बन गया है, वह पवित्र हो गया है और ब्राह्मण पद (द्विजत्वं जायते नृणां) को प्राप्त कर चुका है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)