श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.16.13 
शूद्र - वैष्णवेर घरे याय भेट लञा ।
एइ - मत ताँर उच्छिष्ट खाय लुकाञा ॥13॥
 
 
अनुवाद
वह शूद्र परिवारों में जन्मे वैष्णवों के घर भी उपहार लेकर जाता था। फिर वह छिप जाता और इस तरह उनके द्वारा फेंके गए बचे हुए भोजन को खा जाता।
 
He would also bring gifts to the homes of Vaishnavas born in Shudra families. He would then hide and eat the leftovers thrown away.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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