श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 119
 
 
श्लोक  3.16.119 
व्रजातुल - कुलाङ्गनेतर - रसालि - तृष्णा - हर - प्रदीव्यदधरामृतः सुकृति - लभ्य - फेला - लवः ।
सुधा - जिदहिवल्लिका - सुदल - वीटिका - चर्वितः स मे मदन - मोहनः सखि तनोति जिह्वा - स्पृहाम् ॥119॥
 
 
अनुवाद
"मेरे प्रिय मित्र, भगवान कृष्ण के मुख से निकला सर्वोत्कृष्ट अमृत अनेकानेक पुण्य कर्मों के पश्चात ही प्राप्त होता है। वृन्दावन की सुन्दरी गोपियों के लिए वह अमृत अन्य सभी स्वादों की इच्छा को नष्ट कर देता है। मदनमोहन सदैव स्वर्ग के अमृत से भी बढ़कर पान चबाते हैं। वे निश्चय ही मेरी जिह्वा की वासनाओं को बढ़ा रहे हैं।"
 
"O friend, the incomparable nectar from the lips of the Supreme Personality of Godhead, Krishna, can only be obtained after numerous virtuous deeds. For the beautiful gopis of Vrindavan, that nectar dispels the desire for all other tastes. Madan Mohan always eats betel leaf, which surpasses even the nectar of heaven. He is certainly increasing the desires of our tongues."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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