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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 16: श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा कृष्ण के अधरों का अमृतपान  »  श्लोक 108-109
 
 
श्लोक  3.16.108-109 
प्रभु कहे, - “एइ सब हय ‘प्राकृत’ द्रव्य ।
ऐक्षव, कर्पूर, मरिच, एलाइच, लवङ्ग, गव्य ॥108॥
रसवास, गुड़त्वक - आदि यत सब ।
‘प्राकृत’ वस्तुर स्वाद सबार अनुभव ॥109॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "ये सभी पदार्थ, जैसे चीनी, कपूर, काली मिर्च, इलायची, लौंग, मक्खन, मसाले और मुलेठी, भौतिक हैं। इन भौतिक पदार्थों का स्वाद सभी ने पहले लिया है।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, "Sugar, camphor, black pepper, cardamom, cloves, butter, spices, and licorice—these are all material things. Everyone has tasted these material things before.
तात्पर्य
प्राकृत शब्द का अर्थ है, सशर्त आत्मा की इन्द्रियसुखों की संतुष्टि के लिए चखा गया पदार्थ। ऐसी चीजें भौतिक नियमों से सीमित होती हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु यह बताना चाहते हैं कि भौतिक चीजों को पहले से ही भौतिक विषयों में लिप्त लोगों ने अनुभव किया है, जो केवल इन्द्रिय-सुख में रुचि रखते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)