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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 15: श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य उन्माद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  3.15.8 
एक - बारे स्फुरे प्रभुर कृष्णेर पञ्च - गुण ।
पञ्च - गुणे करे पञ्चेन्द्रिय आकर्षण ॥8॥
 
 
अनुवाद
जब श्री चैतन्य महाप्रभु को भगवान जगन्नाथ के स्वयं कृष्ण होने का एहसास हुआ, तो भगवान चैतन्य की पांचों इंद्रियां तुरंत भगवान कृष्ण के पांच गुणों के प्रति आकर्षित हो गईं।
 
When Sri Chaitanya Mahaprabhu experienced Krishna Himself in Jagannatha, Mahaprabhu's five senses were immediately attracted by the five qualities of Lord Krishna.
तात्पर्य
श्री कृष्ण का सौंदर्य भगवान चैतन्य महाप्रभु की आँखों को आकर्षित करता था, कृष्ण का गायन और उनकी बाँसुरी की आवाज़ भगवान के कानों को आकर्षित करती थी, कृष्ण के चरण कमलों की दिव्य सुगंध उनके नथुनों को आकर्षित करती थी, कृष्ण की अतिरिक्त मिठास उनकी जीभ को आकर्षित करती थी, और कृष्ण के शारीरिक स्पर्श ने भगवान के स्पर्श की भावना को आकर्षित किया। इस प्रकार, श्री चैतन्य महाप्रभु की पाँचों इंद्रियाँ भगवान कृष्ण के पाँच गुणों में से एक की ओर आकर्षित हुईं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)