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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  3.14.7 
स्वरूप - गोसाञि आर रघुनाथ - दास ।
एइ दुइर कड़चाते ए - लीला प्रकाश ॥7॥
 
 
अनुवाद
स्वरूप दामोदर गोस्वामी और रघुनाथ दास गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु की इन सभी दिव्य गतिविधियों को अपनी नोटबुक में दर्ज किया।
 
Swarupa Damodara Goswami and Raghunatha Dasa Goswami have recorded all these divine activities of Sri Chaitanya Mahaprabhu in their Smritis.
तात्पर्य
भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृष्ण से वियोग की अलौकिक भावना और उसके बाद के पागलपन को भौतिक पटल पर खड़ा कोई भी व्यक्ति समझ नहीं सकता है| फिर भी, नादिया-नागरी नामक तथाकथित भक्तों का एक समूह अचानक उभरा और विष्णुप्रिया की पूजा शुरू की| यह निश्चित रूप से श्री चैतन्य महाप्रभु के लीलाओं के विषय में उनकी अज्ञानता को दर्शाता है| भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर के विचार अनुसार, ऐसी पूजा कल्पना का एक उत्पाद है| चैतन्य महाप्रभु की पूजा करने के कई अन्य तरीके भी शुरू किए गए हैं, लेकिन उन सभी को भक्तिविनोद ठाकुर जैसे कट्टर भक्तों ने खारिज कर दिया है| श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने ऐसी अनधिकृत पूजा करने वाले समूहों को सूचीबद्ध किया है:

उलु, बौल, कर्ताबाज, नेदा, दरवेश, सांगी,

सहजिया, सखी-वेषी, स्मार्त, जगत-गोसाईं,

अतिवादी, चूड़ाधारी, गौरांग-नागरी

स्वरूप दामोदर गोस्वामी और रघुनाथ दास गोस्वामी ने चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से देखा और उन्हें दो नोटबुक में दर्ज किया| इसलिए, इन नोटबुक्स के संदर्भ के बिना श्री चैतन्य महाप्रभु की गतिविधियों को समझना संभव नहीं है| श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा के लिए कोई नया तरीका ईजाद करने वाला निश्चित रूप से भगवान के लीलाओं को समझने में असमर्थ है, क्योंकि वह भगवान से संपर्क करने की वास्तविक प्रक्रिया से रहित है|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)