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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 14: श्री चैतन्य महाप्रभु का कृष्ण-विरह भाव  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  3.14.25 
देखिया गोविन्द आस्ते - व्यस्ते स्त्रीके वर्जिला ।
तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥25॥
 
 
अनुवाद
जब चैतन्य महाप्रभु के निजी सेवक गोविंद ने यह देखा तो उन्होंने तुरन्त उसे उसके स्थान से नीचे उतार दिया। हालाँकि, श्री चैतन्य महाप्रभु ने इसके लिए उसे फटकार लगाई।
 
Seeing this, Sri Chaitanya Mahaprabhu's personal assistant, Govinda, quickly brought him down. However, Sri Chaitanya Mahaprabhu rebuked Govinda for this.
तात्पर्य
चूंकि गरुण भगवान विष्णु के वाहन हैं, इसलिए वे सर्वोच्च वैष्णव हैं। इसलिये उनके शरीर को पैरों से छूना या गरुण स्तंभ पर चढ़ना निश्चित रूप से वैष्णव-अपराध है, वैष्णव का अपमान है। वह स्त्री श्री चैतन्य महाप्रभु के कंधे पर अपना पैर रखकर भी कृष्ण को अपमानित कर रही थी। इन सभी अपराधों को देखकर गोविंद ने बहुत जल्दी उसे नीचे उतारा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)