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श्लोक 3.13.95  |
नाना सेवा क रि’ करे पाद - सम्वाहन ।
ताते रघुनाथेर हय सङ्कचित मन ॥95॥ |
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| अनुवाद |
| रामदास ने रघुनाथ भट्ट की अनेक प्रकार से सेवा की, यहाँ तक कि उनके पैरों की मालिश भी की। रघुनाथ भट्ट को यह सारी सेवा स्वीकार करने में थोड़ी हिचकिचाहट हुई। |
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| Ramdas served Raghunath Bhatt in many ways, even massaging his feet. Raghunath Bhatt was hesitant to accept such service. |
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