श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  3.13.86 
ए - ऋण शोधिते आमि नारिमु तोमार” ।
गोविन्द कहे , - जगन्नाथ राखेन मुइ को छार’? ॥86॥
 
 
अनुवाद
“मैं आपका ऋण कभी नहीं चुका पाऊँगा।” गोविंदा ने उत्तर दिया, “भगवान जगन्नाथ ने आपको बचाया है। मैं तुच्छ हूँ।” गोविंदा ने उत्तर दिया, “भगवान जगन्नाथ ने आपको बचाया है। मैं तुच्छ हूँ।”
 
"I will never be able to repay your debt." Govinda replied, "Lord Jagannatha saved you. I am just insignificant."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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