श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  3.13.52 
रातुल वस्त्र देखि’ पण्डित प्रेमाविष्ट ह - इला ।
‘महाप्रभुर प्रसाद’ जानि’ ताँहारे पुछिला ॥52॥
 
 
अनुवाद
जगदानंद पंडित ने उस लाल वस्त्र को चैतन्य महाप्रभु का उपहार समझकर प्रेम से अभिभूत हो गए। उन्होंने सनातन गोस्वामी से प्रश्न किया।
 
Jagadananda Pandit, believing the red cloth to be a gift from Sri Chaitanya Mahaprabhu, was overwhelmed with love. He then asked Sanatana Goswami.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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