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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.13.37 
दूरे रहि’ भक्ति करिह सङ्गे ना रहिबा ।
ताँ - सबार आचार - चेष्टा ल - इते नारिबा ॥37॥
 
 
अनुवाद
मथुरावासियों के साथ खुलेआम घुलना-मिलना नहीं; उन्हें दूर से ही आदर देना। चूँकि तुम भक्ति के एक अलग स्तर पर हो, इसलिए तुम उनके आचरण और आचरण को नहीं अपना सकते।
 
"Do not mingle freely with the residents of Mathura; show them respect from a distance. Since you are at a different level of devotion, you cannot adopt their manners and behavior.
तात्पर्य
वृन्दाना और मथुरा के निवासी कृष्ण के भक्त हैं, पारिवारिक प्रेम में, और उनकी भावनाएँ हमेशा स्मार्त-ब्राह्मणों के विचारों से टकराती रहती हैं। जो भक्त कृष्ण की भव्यता में पूजा करते हैं, वे मथुरा और वृंदावन के निवासियों की पारिवारिक भक्तिपूर्ण भावनाओं को नहीं समझ सकते, जो सहज प्रेम के मार्ग का पालन करते हैं। विधि-मार्ग (विनियमित भक्ति सिद्धांत) के मंच पर भक्त राग-मार्ग (सहज प्रेम में भक्ति सेवा) के मंच पर उन लोगों की गतिविधियों को गलत समझ सकते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगदानंद पंडित को वृंदावन के निवासियों, जो सहज भक्त थे, से अलग रहने का निर्देश दिया, ताकि उनके प्रति अपमानजनक व्यवहार न हो।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)