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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 133
 
 
श्लोक  3.13.133 
वैष्णवेर निन्द्य - कर्म नाहि पाडे काणे ।
सबे कृष्ण भजन करे, - एइ - मात्र जाने ॥133॥
 
 
अनुवाद
वह न तो किसी वैष्णव की निन्दा सुनता था, न ही किसी वैष्णव के दुर्व्यवहार की चर्चा सुनता था। वह केवल इतना जानता था कि सभी कृष्ण की सेवा में लगे हुए हैं; उसे और कुछ समझ में नहीं आता था।
 
He would neither listen to the slander of a Vaishnava nor hear of any Vaishnava's misconduct. He knew only that everyone was engaged in the service of Krishna. He understood nothing else.
तात्पर्य
रघुनाथ भट्ट ने कभी भी किसी वैष्णव को दुख नहीं पहुंचाया। दूसरे शब्दों में, वे भगवान की सेवा में कभी लापरवाह नहीं थे, और उन्होंने कभी भी एक पवित्र वैष्णव के नियमों का उल्लंघन नहीं किया। एक वैष्णव आचार्य का कर्तव्य यह है कि वह अपने शिष्यों और अनुयायियों को वैष्णव व्यवहार के सिद्धांतों का उल्लंघन करने से रोके। उसे उन्हें हमेशा नियमों का पालन करने की सलाह देनी चाहिए, जिससे वे गिरने से बचेंगे। हालांकि वैष्णव प्रचारक कभी-कभी दूसरों की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन रघुनाथ भट्ट ने इससे परहेज़ किया। भले ही कोई अन्य वैष्णव वास्तव में गलती पर था, रघुनाथ भट्ट उसकी आलोचना नहीं करते थे; उन्हें केवल यह दिखता था कि हर कोई कृष्ण की सेवा में लगा हुआ था। यही एक महा-भागवत की स्थिति होती है। दरअसल, अगर कोई माया की सेवा कर रहा है, तो भी उच्च अर्थ में वह कृष्ण का सेवक है। क्योंकि माया कृष्ण की सेविका है, जो कोई माया की सेवा करता है वह अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण की सेवा करता है। इसलिए कहा जाता है:

केहा माने, केहा ना माने, सबा ताँरा दाँसा

ये ना माने, तारा हया सेई पापे नाशा

"कुछ उसे स्वीकार करते हैं, जबकि अन्य नहीं करते हैं, फिर भी हर कोई उसका सेवक है। जो उसे स्वीकार नहीं करता, वह अपनी पापपूर्ण गतिविधियों से नष्ट हो जाएगा।" (सीसी. आदि 6.85)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)