श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 3: अन्त्य लीला  »  अध्याय 13: जगदानन्द पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  3.13.127 
अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते ।
नेत्र कण्ठ रोधे बाष्प, ना पारे पड़िते ॥127॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से उन्हें प्रेमोन्मत्तता के लक्षण अनुभव हुए—आँसू, कम्पन और स्वर का लड़खड़ाना। उनकी आँखें आँसुओं से भर गईं और गला रुँध गया, जिससे वे श्रीमद्भागवत का पाठ न कर सके।
 
By the grace of Sri Chaitanya Mahaprabhu, he would exhibit symptoms of love—tears, trembling, and speech impediment. His eyes would fill with tears, his throat would become choked, and he would be unable to recite the Srimad Bhagavatam.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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