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श्लोक 3.13.107  |
रघुनाथ - भट्ट - पाके अति सुनिपुण ।
येइ रान्धे, सेइ हय अमृतेर सम ॥107॥ |
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| अनुवाद |
| रघुनाथ भट्ट एक कुशल रसोइया थे। वे जो भी बनाते, उसका स्वाद अमृत के समान होता था। |
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| Raghunath Bhatt was a skilled cook. Whatever he cooked tasted like nectar. |
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